श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 235: ब्राह्मणके कर्तव्यका प्रतिपादन करते हुए कालरूप नदको पार करनेका उपाय बतलाना  »  श्लोक 7-8h
 
 
श्लोक  12.235.7-8h 
वीतहर्षमदक्रोधो ब्राह्मणो नावसीदति।
दानमध्ययनं यज्ञस्तपो ह्रीरार्जवं दम:॥ ७॥
एतैर्वर्धयते तेज: पाप्मानं चापकर्षति।
 
 
अनुवाद
जो ब्राह्मण हर्ष, अभिमान और क्रोध से मुक्त है, उसे कभी दुःख नहीं भोगना पड़ता। दान, वेदों का अध्ययन, यज्ञ, तप, शील, सरलता और संयम - इन गुणों से ब्राह्मण अपनी कीर्ति बढ़ाता है और अपने पापों का नाश करता है। 7 1/2
 
A Brahmin who is free from joy, pride and anger never has to suffer. Charity, study of Vedas, sacrifices, austerity, modesty, simplicity and self-control - with these virtues a Brahmin increases his glory and destroys his sins. 7 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)