श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 235: ब्राह्मणके कर्तव्यका प्रतिपादन करते हुए कालरूप नदको पार करनेका उपाय बतलाना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  12.235.25 
वर्तेत तेषु गृहवानक्रुद्धॺन्ननसूयक:।
पञ्चभि: सततं यज्ञैर्विघसाशी यजेत च॥ २५॥
 
 
अनुवाद
गृहस्थ ब्राह्मण को क्रोध और दोष-निंदा का त्याग करके उपर्युक्त नियमों का पालन करना चाहिए। उसे प्रतिदिन पंच महायज्ञ करना चाहिए और यज्ञ से बचे हुए अन्न का ही सेवन करना चाहिए।॥25॥
 
A householder Brahmin should abandon anger and fault-finding and remain engaged in following the above-mentioned rules. He should perform the Pancha Mahayajnas daily and eat only the food left over from the yajna.॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)