श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 235: ब्राह्मणके कर्तव्यका प्रतिपादन करते हुए कालरूप नदको पार करनेका उपाय बतलाना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  12.235.23 
अवदातेषु संजातस्त्रिसंदेहस्त्रिकर्मकृत्।
तस्मादुन्मज्जने तिष्ठेत् प्रज्ञया निस्तरेद् यथा॥ २३॥
 
 
अनुवाद
कुलीन कुल में उत्पन्न ब्राह्मण को चाहिए कि वह विद्याध्ययन, दान और दान ग्रहण करने को संदेह की दृष्टि से देखे (कहीं उनमें आसक्त न हो जाए) और विद्याध्ययन, दान और दान-इन तीनों कर्तव्यों का पालन अवश्य करे। उसे चाहिए कि वह किसी भी प्रकार बुद्धि द्वारा अपने उद्धार का प्रयत्न करे और उस काल रूपी नदी को पार कर जाए॥23॥
 
A Brahmin born in a noble family should look at teaching, offerings and receiving gifts with a suspicious eye (lest he get attached to them) and should definitely perform the three duties of study, offerings and giving. He should try to redeem himself by any means by wisdom and cross that river of time.॥23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)