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mahabharat 12.234.5: चाहे तो वह स्त्री से विवाह करके गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए संतान उत्पन्न कर सकता है, अथवा आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर सकता है, अथवा वन में रहकर वानप्रस्थ धर्म का पालन कर सकता है, अथवा गुरु के पास रह सकता है, अथवा संन्यास धर्म के अनुसार जीवन व्यतीत कर सकता है ॥5॥   |   mahabharat अध्याय 12.234: ब्राह्मणोंका कर्तव्य और उन्हें दान देनेकी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 234: ब्राह्मणोंका कर्तव्य और उन्हें दान देनेकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.234.5 
प्रजासर्गेण दारैश्च ब्रह्मचर्येण वा पुन:।
वने गुरुसकाशे वा यतिधर्मेण वा पुन:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
चाहे तो वह स्त्री से विवाह करके गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए संतान उत्पन्न कर सकता है, अथवा आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर सकता है, अथवा वन में रहकर वानप्रस्थ धर्म का पालन कर सकता है, अथवा गुरु के पास रह सकता है, अथवा संन्यास धर्म के अनुसार जीवन व्यतीत कर सकता है ॥5॥
 
If he wishes, he may marry a woman and produce children while following the household dharma, or follow the vow of celibacy throughout his life, or live in a forest and follow the Vanaprastha dharma, or stay near a guru, or spend his life according to the sannyasa dharma. ॥5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)