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mahabharat 12.234.14-15: जो दरिद्र हैं, लज्जा से मुँह छिपाते हैं और अत्यन्त व्यथित हैं, अथवा जो अपनी शक्ति के अनुसार अपनी आध्यात्मिक उन्नति के लिए प्रयत्न करना चाहते हैं, ऐसे पृथ्वी के देवताओं को उनकी शक्ति के अनुसार अर्जित धन से दान देना चाहिए। योग्य एवं प्रतिष्ठित ब्राह्मणों के लिए कुछ भी अनुचित नहीं है। ऐसे सुपात्रों के लिए तो उत्तम गुणों वाला घोड़ा भी दिया जा सकता है, ऐसा श्रेष्ठ पुरुषों का मत है। ॥14-15॥   |   mahabharat अध्याय 12.234: ब्राह्मणोंका कर्तव्य और उन्हें दान देनेकी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 234: ब्राह्मणोंका कर्तव्य और उन्हें दान देनेकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 14-15
 
 
श्लोक  12.234.14-15 
अन्तर्हिताधितप्तानां यथाशक्ति बुभूषताम्।
देवानामतिशक्त्यापि देयमेषां कृतादपि॥ १४॥
अर्हतामनुरूपाणां नादेयं ह्यस्ति किंचन।
उच्चै:श्रवसमप्यश्वं प्रापणीयं सतां विदु:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
जो दरिद्र हैं, लज्जा से मुँह छिपाते हैं और अत्यन्त व्यथित हैं, अथवा जो अपनी शक्ति के अनुसार अपनी आध्यात्मिक उन्नति के लिए प्रयत्न करना चाहते हैं, ऐसे पृथ्वी के देवताओं को उनकी शक्ति के अनुसार अर्जित धन से दान देना चाहिए। योग्य एवं प्रतिष्ठित ब्राह्मणों के लिए कुछ भी अनुचित नहीं है। ऐसे सुपात्रों के लिए तो उत्तम गुणों वाला घोड़ा भी दिया जा सकता है, ऐसा श्रेष्ठ पुरुषों का मत है। ॥14-15॥
 
Those who are poverty stricken and who hide in shame and are very distressed, or who want to make efforts for their spiritual progress as per their capability, such gods of the earth should be given according to their capability from the wealth earned. Nothing is undue for the worthy and respectable Brahmins. For such worthy people, even a horse with high quality can be given, this is the opinion of the best men. ॥14-15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)