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mahabharat 12.234.12: जब यजमान, शिष्य या कन्या के शुल्क से बहुत-सा धन प्राप्त हो जाए, तो उससे यज्ञ करना चाहिए, दान देना चाहिए और उस धन को अकेले किसी भी प्रकार व्यय नहीं करना चाहिए ॥12॥   |   mahabharat अध्याय 12.234: ब्राह्मणोंका कर्तव्य और उन्हें दान देनेकी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 234: ब्राह्मणोंका कर्तव्य और उन्हें दान देनेकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  12.234.12 
याज्यत: शिष्यतो वापि कन्याया वा धनं महत्।
यदाऽऽगच्छेद् यजेद् दद्यान्नैकोऽश्नीयात् कथंचन॥ १२॥
 
 
अनुवाद
जब यजमान, शिष्य या कन्या के शुल्क से बहुत-सा धन प्राप्त हो जाए, तो उससे यज्ञ करना चाहिए, दान देना चाहिए और उस धन को अकेले किसी भी प्रकार व्यय नहीं करना चाहिए ॥12॥
 
When a lot of wealth is obtained from a host, a disciple or by the fee of a bride, then one should perform a yajna with it, give charity and should not spend that money alone in any way. ॥12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)