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mahabharat 12.233.19: इस प्रकार यह जगत् अव्यक्त परब्रह्म में बार-बार फैलता और विलीन होता है। ब्रह्मा का दिन एक हजार चतुर्युग का होता है और उनकी रात्रि भी उतनी ही लम्बी होती है; यह पहले ही कहा जा चुका है॥19॥   |   mahabharat अध्याय 12.233: ब्राह्मप्रलय एवं महाप्रलयका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 233: ब्राह्मप्रलय एवं महाप्रलयका वर्णन  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  12.233.19 
एवं विस्तारसंक्षेपौ ब्रह्माव्यक्ते पुन: पुन:।
युगसाहस्रयोरादावहोरात्रस्तथैव च॥ १९॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार यह जगत् अव्यक्त परब्रह्म में बार-बार फैलता और विलीन होता है। ब्रह्मा का दिन एक हजार चतुर्युग का होता है और उनकी रात्रि भी उतनी ही लम्बी होती है; यह पहले ही कहा जा चुका है॥19॥
 
In this manner, the universe expands and dissolves repeatedly in the unmanifested Supreme Brahman. Brahma's day is of one thousand Chaturyuga and his night is also of the same length; this has already been told.॥19॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने त्रयस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २३३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकका अनुप्रश्नविषयक दो सौ तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २३३॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)