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mahabharat 12.232.39: जैसे वर्षा ऋतु में वर्षा के कारण समस्त स्थावर-जंगम वस्तुएँ बढ़ती हैं और वर्षा समाप्त होने पर क्षीण होने लगती हैं, वैसे ही प्रत्येक युग में धर्म और अधर्म घटते-बढ़ते रहते हैं ॥ 39॥   |   mahabharat अध्याय 12.232: व्यासजीका शुकदेवको सृष्टिके उत्पत्ति-क्रम तथा युगधर्मोंका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 232: व्यासजीका शुकदेवको सृष्टिके उत्पत्ति-क्रम तथा युगधर्मोंका उपदेश  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  12.232.39 
यथा विश्वानि भूतानि वृष्टॺा भूयांसि प्रावृषि।
सृज्यन्ते जङ्गमस्थानि तथा धर्मा युगे युगे॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
जैसे वर्षा ऋतु में वर्षा के कारण समस्त स्थावर-जंगम वस्तुएँ बढ़ती हैं और वर्षा समाप्त होने पर क्षीण होने लगती हैं, वैसे ही प्रत्येक युग में धर्म और अधर्म घटते-बढ़ते रहते हैं ॥ 39॥
 
Just as during the rainy season all the movable and immovable objects grow due to the rainfall and after the rains are over they start diminishing, similarly in every age, Dharma (righteousness) and Adharma (irreligion) keep on increasing and decreasing. ॥ 39॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)