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mahabharat 12.232.38: सत्ययुग में मनुष्य अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार यज्ञ, व्रत और तीर्थ आदि करते हैं और त्रेता में वेदान्ती और स्वाध्यायी मनुष्य शास्त्रविधि के अनुसार धर्म का ह्रास होने के कारण दुष्कृत्यों से ग्रस्त होते हैं ॥38॥   |   mahabharat अध्याय 12.232: व्यासजीका शुकदेवको सृष्टिके उत्पत्ति-क्रम तथा युगधर्मोंका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 232: व्यासजीका शुकदेवको सृष्टिके उत्पत्ति-क्रम तथा युगधर्मोंका उपदेश  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  12.232.38 
सधर्मव्रतसंयोगं यथाधर्मं युगे युगे।
विक्रियन्ते स्वधर्मस्था वेदवादा यथागमम्॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
सत्ययुग में मनुष्य अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार यज्ञ, व्रत और तीर्थ आदि करते हैं और त्रेता में वेदान्ती और स्वाध्यायी मनुष्य शास्त्रविधि के अनुसार धर्म का ह्रास होने के कारण दुष्कृत्यों से ग्रस्त होते हैं ॥38॥
 
In Satyayuga, people perform Yagya, fast and pilgrimage etc. as per their nature and in Treta Yuga, Vedantists and self-devout men suffer from vices due to the decline of religion as per the scriptures. 38॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)