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mahabharat 12.232.32: यज्ञ करने का यह नियम केवल त्रेता युग में था, सत्य युग में नहीं। द्वापर युग से यज्ञ धीरे-धीरे कम होते गए और कलियुग में लुप्त हो गए। 32.   |   mahabharat अध्याय 12.232: व्यासजीका शुकदेवको सृष्टिके उत्पत्ति-क्रम तथा युगधर्मोंका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 232: व्यासजीका शुकदेवको सृष्टिके उत्पत्ति-क्रम तथा युगधर्मोंका उपदेश  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  12.232.32 
त्रेतायुगे विधिस्त्वेष यज्ञानां न कृते युगे।
द्वापरे विप्लवं यान्ति यज्ञा: कलियुगे तथा॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
यज्ञ करने का यह नियम केवल त्रेता युग में था, सत्य युग में नहीं। द्वापर युग से यज्ञ धीरे-धीरे कम होते गए और कलियुग में लुप्त हो गए। 32.
 
This rule of performing yagnas was only in Treta Yuga, not in Satya Yuga. Gradually, yagnas diminished from Dwapara Yuga onwards and vanished in Kali Yuga. 32.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)