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mahabharat 12.232.30: ब्रह्म के दो स्वरूप जानने चाहिए - एक शब्दब्रह्म और दूसरा परब्रह्म, जो शब्दब्रह्म अर्थात् वेद का पूर्ण विद्वान है, वही परब्रह्म का साक्षात्कार सहज ही कर सकता है ॥30॥   |   mahabharat अध्याय 12.232: व्यासजीका शुकदेवको सृष्टिके उत्पत्ति-क्रम तथा युगधर्मोंका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 232: व्यासजीका शुकदेवको सृष्टिके उत्पत्ति-क्रम तथा युगधर्मोंका उपदेश  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  12.232.30 
द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म परं च यत् ।
शब्दब्रह्मणि निष्णात: परं ब्रह्माधिगच्छति॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्म के दो स्वरूप जानने चाहिए - एक शब्दब्रह्म और दूसरा परब्रह्म, जो शब्दब्रह्म अर्थात् वेद का पूर्ण विद्वान है, वही परब्रह्म का साक्षात्कार सहज ही कर सकता है ॥30॥
 
Two forms of Brahma should be known - one is ShabdaBrahm and the other is ParaBrahm, the one who is a complete scholar of ShabdaBrahm i.e. Veda, can easily interview ParaBrahm. 30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)