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mahabharat 12.231.7-8: अंग और उपनिषदों सहित सम्पूर्ण वेदों का अध्ययन करने के पश्चात् नैतिक कर्मों को जानने की इच्छा से व्यासपुत्र शुकदेव ने अपने पिता श्री कृष्णद्वैपायन व्यास की धर्म-विद्या में निपुणता देखकर उनसे अपनी शंका पूछी। उनका विश्वास था कि पिता के उपदेश से धर्म और अर्थशास्त्र के विषय में उनकी समस्त शंकाएँ दूर हो जाएँगी। 7-8॥   |   mahabharat अध्याय 12.231: शुकदेवजीका प्रश्न और व्यासजीका उनके प्रश्नोंका उत्तर देते हुए कालका स्वरूप बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 231: शुकदेवजीका प्रश्न और व्यासजीका उनके प्रश्नोंका उत्तर देते हुए कालका स्वरूप बताना  »  श्लोक 7-8
 
 
श्लोक  12.231.7-8 
अधीत्य वेदानखिलान् साङ्गोपनिषदस्तथा।
अन्विच्छन्नैष्ठिकं कर्म धर्मनैपुणदर्शनात्॥ ७॥
कृष्णद्वैपायनं व्यासं पुत्रो वैयासकि: शुक:।
पप्रच्छ संदेहमिमं छिन्नधर्मार्थसंशयम्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
अंग और उपनिषदों सहित सम्पूर्ण वेदों का अध्ययन करने के पश्चात् नैतिक कर्मों को जानने की इच्छा से व्यासपुत्र शुकदेव ने अपने पिता श्री कृष्णद्वैपायन व्यास की धर्म-विद्या में निपुणता देखकर उनसे अपनी शंका पूछी। उनका विश्वास था कि पिता के उपदेश से धर्म और अर्थशास्त्र के विषय में उनकी समस्त शंकाएँ दूर हो जाएँगी। 7-8॥
 
After studying the entire Vedas including the Angas and Upanishads, Vyas's son Shukdev, desirous of knowing the ethical actions, seeing the expertise of his father Shri Krishnadvaipayan Vyas in the matter of religious knowledge, asked him his own doubt. He believed that his father's teachings would remove all his doubts regarding religion and economics. 7-8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)