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mahabharat 12.231.32: रात्रि के अंत में जागकर ब्रह्माजी पहले अपने अविनाशी स्वरूप को माया के मल से मुक्त करते हैं और फिर महातत्त्व की रचना करते हैं। तत्पश्चात् स्थूल जगत को धारण करने वाला मन उत्पन्न होता है। 32॥   |   mahabharat अध्याय 12.231: शुकदेवजीका प्रश्न और व्यासजीका उनके प्रश्नोंका उत्तर देते हुए कालका स्वरूप बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 231: शुकदेवजीका प्रश्न और व्यासजीका उनके प्रश्नोंका उत्तर देते हुए कालका स्वरूप बताना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  12.231.32 
प्रतिबुद्धो विकुरुते ब्रह्माक्षय्यं क्षपाक्षये।
सृजते च महद्भूतं तस्माद् व्यक्तात्मकं मन:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
रात्रि के अंत में जागकर ब्रह्माजी पहले अपने अविनाशी स्वरूप को माया के मल से मुक्त करते हैं और फिर महातत्त्व की रचना करते हैं। तत्पश्चात् स्थूल जगत को धारण करने वाला मन उत्पन्न होता है। 32॥
 
Brahmaji, who woke up at the end of the night, first makes his indestructible form free from the impurities of Maya and then creates Mahatattva. After that, the mind which supports the physical world is born. 32॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने एकत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २३१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकका अनुप्रश्नविषयक दो सौ इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २३१॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)