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mahabharat 12.231.15: सूर्यदेव मनुष्य लोक के दिन और रात का विभाजन करते हैं। रात्रि प्राणियों के सोने के लिए है और दिन काम करने के लिए है॥15॥   |   mahabharat अध्याय 12.231: शुकदेवजीका प्रश्न और व्यासजीका उनके प्रश्नोंका उत्तर देते हुए कालका स्वरूप बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 231: शुकदेवजीका प्रश्न और व्यासजीका उनके प्रश्नोंका उत्तर देते हुए कालका स्वरूप बताना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.231.15 
अहोरात्रे विभजते सूर्यो मानुषलौकिके।
रात्रि: स्वप्नाय भूतानां चेष्टायै कर्मणामह:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
सूर्यदेव मनुष्य लोक के दिन और रात का विभाजन करते हैं। रात्रि प्राणियों के सोने के लिए है और दिन काम करने के लिए है॥15॥
 
The Sun God divides the day and night of the human world. Night is for the creatures to sleep and day is for working.॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)