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mahabharat 12.230.5: नारदजी में शास्त्रों का ज्ञान और चरित्र-बल दोनों ही विद्यमान हैं। फिर भी, अपने उत्तम चरित्र के कारण उनके मन में अभिमान का लेशमात्र भी नहीं है। वह अभिमान शरीर को कष्ट देता है। उसके अभाव के कारण ही नारदजी सर्वत्र पूजित (आदरणीय) हैं॥ 5॥   |   mahabharat अध्याय 12.230: श्रीकृष्ण और उग्रसेनका संवाद—नारदजीकी लोकप्रियताके हेतुभूत गुणोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.230.5 
न चारित्रनिमित्तोऽस्याहंकारो देहतापन:।
अभिन्नश्रुतचारित्रस्तस्मात् सर्वत्र पूजित:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
नारदजी में शास्त्रों का ज्ञान और चरित्र-बल दोनों ही विद्यमान हैं। फिर भी, अपने उत्तम चरित्र के कारण उनके मन में अभिमान का लेशमात्र भी नहीं है। वह अभिमान शरीर को कष्ट देता है। उसके अभाव के कारण ही नारदजी सर्वत्र पूजित (आदरणीय) हैं॥ 5॥
 
Naradji has both the knowledge of scriptures and strength of character combined together. Yet, he does not have even a trace of pride in his mind due to his good character. That pride torments the body. It is because of its absence that Naradji is worshipped (respected) everywhere.॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)