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mahabharat 12.230.23: वह न तो धन के लाभ से प्रसन्न होता है और न उसके अभाव से दुःखी होता है। उसकी बुद्धि स्थिर है और उसका मन आसक्ति रहित है; इसीलिए वह सर्वत्र पूजित है॥23॥   |   mahabharat अध्याय 12.230: श्रीकृष्ण और उग्रसेनका संवाद—नारदजीकी लोकप्रियताके हेतुभूत गुणोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.230.23 
न हृष्यत्यर्थलाभेषु नालाभे तु व्यथत्यपि।
स्थिरबुद्धिरसक्तात्मा तस्मात् सर्वत्र पूजित:॥ २३॥
 
 
अनुवाद
वह न तो धन के लाभ से प्रसन्न होता है और न उसके अभाव से दुःखी होता है। उसकी बुद्धि स्थिर है और उसका मन आसक्ति रहित है; इसीलिए वह सर्वत्र पूजित है॥23॥
 
He is neither pleased by the gain of wealth nor is he saddened by its non-availability. His intellect is steady and his mind is without attachment; that is why he is worshipped everywhere.॥23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)