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श्लोक  12.230.21 
कृतश्रम: कृतप्रज्ञो न च तृप्त: समाधित:।
नित्ययुक्तोऽप्रमत्तश्च तस्मात् सर्वत्र पूजित:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने योगाभ्यास के लिए बहुत परिश्रम किया है। उनकी बुद्धि निर्मल है। वे ध्यान से कभी संतुष्ट नहीं होते। वे अपने कर्तव्यों के पालन में सदैव तत्पर रहते हैं और कभी प्रमाद नहीं करते; इसीलिए उनकी सर्वत्र पूजा होती है।
 
He has worked very hard for the practice of Yoga. His intellect is pure. He is never satisfied with meditation. He is always ready to perform his duties and is never negligent; that is why he is worshipped everywhere.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)