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mahabharat 12.230.19: नारदजी मनुष्यों की नाना प्रकार की मनोवृत्तियों को देखते और समझते हैं। फिर भी वे किसी की निन्दा नहीं करते। वे यह जानने में निपुण हैं कि किसकी संगति कैसी है; इसीलिए वे सर्वत्र पूजे जाते हैं॥19॥   |   mahabharat अध्याय 12.230: श्रीकृष्ण और उग्रसेनका संवाद—नारदजीकी लोकप्रियताके हेतुभूत गुणोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.230.19 
लोकस्य विविधं चित्तं प्रेक्षते चाप्यकुत्सयन्।
संसर्गविद्याकुशलस्तस्मात् सर्वत्र पूजित:॥ १९॥
 
 
अनुवाद
नारदजी मनुष्यों की नाना प्रकार की मनोवृत्तियों को देखते और समझते हैं। फिर भी वे किसी की निन्दा नहीं करते। वे यह जानने में निपुण हैं कि किसकी संगति कैसी है; इसीलिए वे सर्वत्र पूजे जाते हैं॥19॥
 
Naradji sees and understands the various types of mental attitudes of people. Yet he does not criticize anyone. He is very proficient in knowing what kind of company one has; that is why he is worshipped everywhere.॥19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)