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mahabharat 12.230.14: वे अनेक शास्त्रों के विद्वान हैं और उनकी कथा कहने की शैली भी बड़ी अनोखी है। वे ज्ञान के स्वामी होने के साथ-साथ लोभ और बेईमानी से भी रहित हैं। वे नम्रता, क्रोध और लोभ आदि दोषों से सर्वथा मुक्त हैं; इसीलिए उनका सर्वत्र सम्मान होता है॥ 14॥   |   mahabharat अध्याय 12.230: श्रीकृष्ण और उग्रसेनका संवाद—नारदजीकी लोकप्रियताके हेतुभूत गुणोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.230.14 
बहुश्रुतश्चित्रकथ: पण्डितोऽलालसोऽशठ:।
अदीनोऽक्रोधनोऽलुब्धस्तस्मात् सर्वत्र पूजित:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
वे अनेक शास्त्रों के विद्वान हैं और उनकी कथा कहने की शैली भी बड़ी अनोखी है। वे ज्ञान के स्वामी होने के साथ-साथ लोभ और बेईमानी से भी रहित हैं। वे नम्रता, क्रोध और लोभ आदि दोषों से सर्वथा मुक्त हैं; इसीलिए उनका सर्वत्र सम्मान होता है॥ 14॥
 
He is a scholar of many scriptures and his way of narrating stories is also very unique. Along with being a master of knowledge, he is also devoid of greed and dishonesty. He is completely free from the defects of humility, anger and greed; that is why he is respected everywhere.॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)