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mahabharat 12.230.11: वह सबका हृदय से उपकार करता है। उसके मन में पाप का लेशमात्र भी नहीं होता। वह दूसरों का दुःख देखकर प्रसन्न नहीं होता; इसीलिए वह सर्वत्र आदर पाता है॥11॥   |   mahabharat अध्याय 12.230: श्रीकृष्ण और उग्रसेनका संवाद—नारदजीकी लोकप्रियताके हेतुभूत गुणोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.230.11 
कल्याणं कुरुते बाढं पापमस्मिन्न विद्यते।
न प्रीयते परानर्थैस्तस्मात् सर्वत्र पूजित:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
वह सबका हृदय से उपकार करता है। उसके मन में पाप का लेशमात्र भी नहीं होता। वह दूसरों का दुःख देखकर प्रसन्न नहीं होता; इसीलिए वह सर्वत्र आदर पाता है॥11॥
 
He does good to everyone with an open heart. There is not even a trace of sin in his mind. He does not feel happy seeing the misfortune of others; that is why he is respected everywhere.॥ 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)