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mahabharat 12.23.6: युधिष्ठिर! चारों आश्रमों में से यह गृहस्थाश्रम ही एकमात्र ऐसा आश्रम है जिसका उचित रीति से पालन करना अत्यंत कठिन है। जिनकी इन्द्रियाँ दुर्बल हैं, उनके लिए गृहस्थ-धर्म का पालन करना कठिन है। अब तुम उस कठिन धर्म का पालन करो।   |   mahabharat अध्याय 12.23: व्यासजीका शंख और लिखितकी कथा सुनाते हुए राजा सुद्युम्नके दण्डधर्मपालनका महत्त्व सुनाकर युधिष्ठिरको राजधर्ममें ही दृढ़ रहनेकी आज्ञा देना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 23: व्यासजीका शंख और लिखितकी कथा सुनाते हुए राजा सुद्युम्नके दण्डधर्मपालनका महत्त्व सुनाकर युधिष्ठिरको राजधर्ममें ही दृढ़ रहनेकी आज्ञा देना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  12.23.6 
सोऽयं चतुर्णामेतेषामाश्रमाणां दुराचर:।
तं चराद्य विधिं पार्थ दुश्चरं दुर्बलेन्द्रियै:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर! चारों आश्रमों में से यह गृहस्थाश्रम ही एकमात्र ऐसा आश्रम है जिसका उचित रीति से पालन करना अत्यंत कठिन है। जिनकी इन्द्रियाँ दुर्बल हैं, उनके लिए गृहस्थ-धर्म का पालन करना कठिन है। अब तुम उस कठिन धर्म का पालन करो।
 
Yudhishthira! Among the four ashramas, this grihasthashram is the only one which is very difficult to follow properly. It is difficult for those whose senses are weak to follow the grihasth-dharma. Now you follow that difficult dharma.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)