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mahabharat 12.23.45: व्यासजी कहते हैं - पाण्डवश्रेष्ठ युधिष्ठिर ! उस दण्ड-कर्म से राजा सुद्युम्न ने परम पद प्राप्त किया था । उन्होंने प्रचेतसपुत्र दक्ष के समान परम सिद्धि प्राप्त की थी ॥45॥   |   mahabharat अध्याय 12.23: व्यासजीका शंख और लिखितकी कथा सुनाते हुए राजा सुद्युम्नके दण्डधर्मपालनका महत्त्व सुनाकर युधिष्ठिरको राजधर्ममें ही दृढ़ रहनेकी आज्ञा देना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 23: व्यासजीका शंख और लिखितकी कथा सुनाते हुए राजा सुद्युम्नके दण्डधर्मपालनका महत्त्व सुनाकर युधिष्ठिरको राजधर्ममें ही दृढ़ रहनेकी आज्ञा देना  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  12.23.45 
व्यास उवाच
स राजा पाण्डवश्रेष्ठ श्रेयान् वै तेन कर्मणा।
प्राप्तवान् परमां सिद्धिं दक्ष: प्राचेतसो यथा॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
व्यासजी कहते हैं - पाण्डवश्रेष्ठ युधिष्ठिर ! उस दण्ड-कर्म से राजा सुद्युम्न ने परम पद प्राप्त किया था । उन्होंने प्रचेतसपुत्र दक्ष के समान परम सिद्धि प्राप्त की थी ॥45॥
 
Vyasji says – Pandavas best Yudhishthir! By that act of punishment, King Sudyumna attained the highest position. He had attained supreme perfection like Daksha, the son of Prachetas. 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)