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mahabharat 12.23.44: शंख ने कहा, "भाई! यह सत्य है, मैं ऐसा कर सकता था; परन्तु तुम्हें दण्ड देने का मुझे अधिकार नहीं है। दण्ड देना राजा का काम है। इस प्रकार दण्ड देने से राजा सुद्युम्न और उस दण्ड को स्वीकार करने से तुम अपने पूर्वजों सहित पवित्र हो गए॥ 44॥   |   mahabharat अध्याय 12.23: व्यासजीका शंख और लिखितकी कथा सुनाते हुए राजा सुद्युम्नके दण्डधर्मपालनका महत्त्व सुनाकर युधिष्ठिरको राजधर्ममें ही दृढ़ रहनेकी आज्ञा देना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 23: व्यासजीका शंख और लिखितकी कथा सुनाते हुए राजा सुद्युम्नके दण्डधर्मपालनका महत्त्व सुनाकर युधिष्ठिरको राजधर्ममें ही दृढ़ रहनेकी आज्ञा देना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  12.23.44 
शंख उवाच
एवमेतन्मया कार्यं नाहं दण्डधरस्तव।
स च पूतो नरपतिस्त्वं चापि पितृभि: सह॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
शंख ने कहा, "भाई! यह सत्य है, मैं ऐसा कर सकता था; परन्तु तुम्हें दण्ड देने का मुझे अधिकार नहीं है। दण्ड देना राजा का काम है। इस प्रकार दण्ड देने से राजा सुद्युम्न और उस दण्ड को स्वीकार करने से तुम अपने पूर्वजों सहित पवित्र हो गए॥ 44॥
 
Shankha said, "Brother! It is true, I could have done so; but I do not have the right to punish you. Punishment is the job of the king. By punishing in this way, King Sudyumna and by accepting that punishment, you along with your ancestors became pure. ॥ 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)