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mahabharat 12.23.4: हे पृथ्वी के स्वामी! देवता, पितर, अतिथि और सेवक सदैव गृहस्थ की शरण में आकर अपना जीवन निर्वाह करते हैं; अतः आप उनकी व्यवस्था कीजिए।॥4॥   |   mahabharat अध्याय 12.23: व्यासजीका शंख और लिखितकी कथा सुनाते हुए राजा सुद्युम्नके दण्डधर्मपालनका महत्त्व सुनाकर युधिष्ठिरको राजधर्ममें ही दृढ़ रहनेकी आज्ञा देना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 23: व्यासजीका शंख और लिखितकी कथा सुनाते हुए राजा सुद्युम्नके दण्डधर्मपालनका महत्त्व सुनाकर युधिष्ठिरको राजधर्ममें ही दृढ़ रहनेकी आज्ञा देना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  12.23.4 
गृहस्थं हि सदा देवा: पितरोऽतिथयस्तथा।
भृत्याश्चैवोपजीवन्ति तान् भरस्व महीपते॥ ४॥
 
 
अनुवाद
हे पृथ्वी के स्वामी! देवता, पितर, अतिथि और सेवक सदैव गृहस्थ की शरण में आकर अपना जीवन निर्वाह करते हैं; अतः आप उनकी व्यवस्था कीजिए।॥4॥
 
O Lord of the earth! The gods, ancestors, guests and servants always take shelter of a householder and live their lives; therefore, you should provide for them. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)