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स गत्वा भ्रातरं शंखमार्तरूपोऽब्रवीदिदम्।
धृतदण्डस्य दुर्बुद्धेर्भवांस्तत् क्षन्तुमर्हति॥ ३७॥
अनुवाद
लिखित अपने भाई शंख के पास गया और दुःखी होकर बोला - 'भाई! मुझे दण्ड मिला है। इस मूर्ख व्यक्ति के अपराध के लिए मुझे क्षमा कर दीजिए।'
Likhit went to his brother Shankh and said in sorrow - 'Brother! I have been punished. Please forgive me for the crime committed by this foolish person.'
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥