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mahabharat 12.23.35: व्यासजी बोले - महामना राजा सुद्युम्न के बार-बार आग्रह करने पर भी ब्रह्मर्षि लिखित ने उस दण्ड के अतिरिक्त कोई अन्य वर नहीं माँगा ॥35॥   |   mahabharat अध्याय 12.23: व्यासजीका शंख और लिखितकी कथा सुनाते हुए राजा सुद्युम्नके दण्डधर्मपालनका महत्त्व सुनाकर युधिष्ठिरको राजधर्ममें ही दृढ़ रहनेकी आज्ञा देना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 23: व्यासजीका शंख और लिखितकी कथा सुनाते हुए राजा सुद्युम्नके दण्डधर्मपालनका महत्त्व सुनाकर युधिष्ठिरको राजधर्ममें ही दृढ़ रहनेकी आज्ञा देना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  12.23.35 
व्यास उवाच
संछन्द्यमानो ब्रह्मर्षि: पार्थिवेन महात्मना।
नान्यं स वरयामास तस्माद् दण्डादृते वरम्॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
व्यासजी बोले - महामना राजा सुद्युम्न के बार-बार आग्रह करने पर भी ब्रह्मर्षि लिखित ने उस दण्ड के अतिरिक्त कोई अन्य वर नहीं माँगा ॥35॥
 
Vyasji said - Despite the repeated requests of Mahamana King Sudyumna, Brahmarshi Likhit did not ask for any other boon except that punishment. 35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)