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mahabharat 12.23.32: हे पुरुषोत्तम! मैंने अपने बड़े भाई की आज्ञा के बिना उनके बगीचे के फल खा लिए हैं; महाराज! कृपया मुझे शीघ्र इसका दण्ड दीजिये।॥32॥   |   mahabharat अध्याय 12.23: व्यासजीका शंख और लिखितकी कथा सुनाते हुए राजा सुद्युम्नके दण्डधर्मपालनका महत्त्व सुनाकर युधिष्ठिरको राजधर्ममें ही दृढ़ रहनेकी आज्ञा देना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 23: व्यासजीका शंख और लिखितकी कथा सुनाते हुए राजा सुद्युम्नके दण्डधर्मपालनका महत्त्व सुनाकर युधिष्ठिरको राजधर्ममें ही दृढ़ रहनेकी आज्ञा देना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  12.23.32 
अनिसृष्टानि गुरुणा फलानि मनुजर्षभ।
भक्षितानि महाराज तत्र मां शाधि मा चिरम्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
हे पुरुषोत्तम! मैंने अपने बड़े भाई की आज्ञा के बिना उनके बगीचे के फल खा लिए हैं; महाराज! कृपया मुझे शीघ्र इसका दण्ड दीजिये।॥32॥
 
'Best of men! I have eaten fruits from my elder brother's garden without his permission; Maharaj! Please punish me for this quickly.'॥ 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)