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mahabharat 12.229.24: मनुष्य को चाहिए कि वह समस्त विषय-कर्मों का त्याग कर दे और अपनी समस्त इन्द्रियों को वश में कर ले। तब वह प्रकृति से परे अविनाशी ब्रह्मपद को प्राप्त होता है। 24॥   |   mahabharat अध्याय 12.229: जैगीषव्यका असित-देवलको समत्वबुद्धिका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 229: जैगीषव्यका असित-देवलको समत्वबुद्धिका उपदेश  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  12.229.24 
सर्वतश्च समाहृत्य क्रतून् सर्वान् जितेन्द्रिय:।
प्राप्नोति ब्रह्मण: स्थानं यत्परं प्रकृतेर्ध्रुवम्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य को चाहिए कि वह समस्त विषय-कर्मों का त्याग कर दे और अपनी समस्त इन्द्रियों को वश में कर ले। तब वह प्रकृति से परे अविनाशी ब्रह्मपद को प्राप्त होता है। 24॥
 
Man should give up all sensual activities and control all his senses. Then he attains the imperishable Brahmapada beyond nature. 24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)