श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 228: दैत्योंको त्यागकर इन्द्रके पास लक्ष्मीदेवीका आना तथा किन सद्‍गुणोंके होनेपर लक्ष्मी आती हैं और किन दुर्गुणोंके होनेपर वे त्यागकर चली जाती हैं, इस बातको विस्तारपूर्वक बताना  »  श्लोक 96
 
 
श्लोक  12.228.96 
त्वया कुरूणां वर यत् प्रचोदितं
भवाभवस्येह परं निदर्शनम्।
तदद्य सर्वं परिकीर्तितं मया
परीक्ष्य तत्त्वं परिगन्तुमर्हसि॥ ९६॥
 
 
अनुवाद
हे कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिर! अभ्युदय-परभव के जिन लक्षणों के विषय में तुमने पूछा था, वही मैंने आज तुम्हें यह उत्तम उदाहरण देकर बताया है। तुम भली-भाँति विचार करके इसकी प्रामाणिकता का निश्चय करो। 96॥
 
Yudhishthir, the best of Kurus! The symptoms of Abhyudaya-Parabhava that you had asked about, I have told you today by giving this excellent example. You should think carefully and decide its authenticity. 96॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि श्री-वासवसंवादो नाम अष्टाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २२८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें लक्ष्मी और इन्द्रका संवादनामक दो सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २२८॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)