श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 228: दैत्योंको त्यागकर इन्द्रके पास लक्ष्मीदेवीका आना तथा किन सद्‍गुणोंके होनेपर लक्ष्मी आती हैं और किन दुर्गुणोंके होनेपर वे त्यागकर चली जाती हैं, इस बातको विस्तारपूर्वक बताना  »  श्लोक 95
 
 
श्लोक  12.228.95 
इमां सपर्यां सह सर्वकामदै:
श्रियश्च शक्रप्रमुखैश्च दैवतै:।
पठन्ति ये विप्रसद: समागता:
समृद्धकामा: श्रियमाप्नुवन्ति ते॥ ९५॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य ब्राह्मणों की सभा में आकर इन्द्र आदि देवताओं द्वारा की गई इस लक्ष्मी पूजा को पढ़ते हैं, जो सब कामनाओं को पूर्ण करने वाली है, उनकी सब कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं और उन्हें लक्ष्मी भी प्राप्त होती है ॥95॥
 
Those who come to the Brahmins and read about this worship of Goddess Lakshmi performed by gods like Indra, who are the fulfillers of all desires, in an assembly of Brahmins, all their desires are fulfilled and they also obtain Lakshmi. ॥95॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)