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mahabharat 12.228.91: तत्पश्चात् निर्मल एवं प्रकाशमान आकाश से स्वयंभू ब्रह्माजी के घर में अमृत की वर्षा होने लगी, देवताओं की तुरहियाँ बिना बजाए ही बजने लगीं और सम्पूर्ण दिशाएँ निर्मल एवं प्रकाशित दिखाई देने लगीं ॥91॥   |   mahabharat अध्याय 12.228: दैत्योंको त्यागकर इन्द्रके पास लक्ष्मीदेवीका आना तथा किन सद्‍गुणोंके होनेपर लक्ष्मी आती हैं और किन दुर्गुणोंके होनेपर वे त्यागकर चली जाती हैं, इस बातको विस्तारपूर्वक बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 228: दैत्योंको त्यागकर इन्द्रके पास लक्ष्मीदेवीका आना तथा किन सद्‍गुणोंके होनेपर लक्ष्मी आती हैं और किन दुर्गुणोंके होनेपर वे त्यागकर चली जाती हैं, इस बातको विस्तारपूर्वक बताना  »  श्लोक 91
 
 
श्लोक  12.228.91 
ततोऽमृतं द्यौ: प्रववर्ष भास्वती
पितामहस्यायतने स्वयम्भुव:।
अनाहता दुन्दुभयोऽथ नेदिरे
तथा प्रसन्नाश्च दिशश्चकाशिरे॥ ९१॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् निर्मल एवं प्रकाशमान आकाश से स्वयंभू ब्रह्माजी के घर में अमृत की वर्षा होने लगी, देवताओं की तुरहियाँ बिना बजाए ही बजने लगीं और सम्पूर्ण दिशाएँ निर्मल एवं प्रकाशित दिखाई देने लगीं ॥91॥
 
Thereafter, the clear and luminous sky started showering nectar in the house of Swayambhu Brahmaji. The trumpets of the gods started ringing without even playing and all the directions appeared clear and illuminated. 91॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)