श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 228: दैत्योंको त्यागकर इन्द्रके पास लक्ष्मीदेवीका आना तथा किन सद्‍गुणोंके होनेपर लक्ष्मी आती हैं और किन दुर्गुणोंके होनेपर वे त्यागकर चली जाती हैं, इस बातको विस्तारपूर्वक बताना  »  श्लोक 90
 
 
श्लोक  12.228.90 
अथेङ्गितं वज्रधरस्य नारद:
श्रियश्च देव्या मनसा विचारयन्।
श्रियै शशंसामरदृष्टपौरुष:
शिवेन तत्रागमनं महर्षिभि:॥ ९०॥
 
 
अनुवाद
उस समय अमरों का पराक्रम देखने वाले नारद मुनि तथा अन्य ऋषियों ने वज्रधारी इन्द्र और धनदेवी के संकेतों का मन में विचार करके वहाँ लक्ष्मीजी के शुभ आगमन की स्तुति की और उनके आगमन को समस्त लोकों के लिए मंगलमय बताया॥90॥
 
At that time, the sage Narada, who had witnessed the valour of the immortals, along with other sages, after contemplating in their minds on the indications of the thunderbolt-bearing Indra and goddess of wealth, praised the auspicious arrival of goddess Lakshmi there and declared her arrival as auspicious for all the worlds.॥ 90॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)