श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 228: दैत्योंको त्यागकर इन्द्रके पास लक्ष्मीदेवीका आना तथा किन सद्‍गुणोंके होनेपर लक्ष्मी आती हैं और किन दुर्गुणोंके होनेपर वे त्यागकर चली जाती हैं, इस बातको विस्तारपूर्वक बताना  »  श्लोक 89
 
 
श्लोक  12.228.89 
ततो दिवं प्राप्य सहस्रलोचन:
श्रियोपपन्न: सुहृदा महर्षिणा।
रथेन हर्यश्वयुजा सुरर्षभ:
सद: सुराणामभिसत्कृतो ययौ॥ ८९॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् सहस्र नेत्रों वाले इन्द्र लक्ष्मीदेवी और अपने मित्र महर्षि नारद के साथ हरे घोड़ों से जुते हुए रथ पर बैठकर स्वर्ग की राजधानी अमरावती में आये और देवताओं पर प्रसन्न होकर उनकी सभा में गये ॥89॥
 
After that, the thousand-eyed Indra along with Lakshmidevi and his friend Maharishi Narada came to Amaravati, the capital of heaven, sitting on a chariot harnessed by green horses, and being pleased with the gods, went to their meeting. 89॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)