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श्री महाभारत
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पर्व 12: शान्ति पर्व
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अध्याय 228: दैत्योंको त्यागकर इन्द्रके पास लक्ष्मीदेवीका आना तथा किन सद्गुणोंके होनेपर लक्ष्मी आती हैं और किन दुर्गुणोंके होनेपर वे त्यागकर चली जाती हैं, इस बातको विस्तारपूर्वक बताना
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श्लोक 85-86h
श्लोक
12.228.85-86h
इत्युक्तवचनां देवीं प्रीत्यर्थं च ननन्दतु:॥ ८५॥
नारदश्चात्र देवर्षिर्वृत्रहन्ता च वासव:।
अनुवाद
(भीष्मजी कहते हैं--) लक्ष्मीदेवी के ऐसा कहने पर देवर्षि नारद और वृत्रहंता इन्द्र ने उनकी प्रसन्नता के लिए उन्हें बधाई दी। 85 1/2॥
(Bhishmaji says—) On Lakshmidevi saying this, Devarshi Narad and Vritrahanta Indra congratulated him for his happiness. 85 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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