श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 228: दैत्योंको त्यागकर इन्द्रके पास लक्ष्मीदेवीका आना तथा किन सद्‍गुणोंके होनेपर लक्ष्मी आती हैं और किन दुर्गुणोंके होनेपर वे त्यागकर चली जाती हैं, इस बातको विस्तारपूर्वक बताना  »  श्लोक 8-9
 
 
श्लोक  12.228.8-9 
तावाप्लुत्य यतात्मानौ कृतजप्यौ समासत:।
नद्या: पुलिनमासाद्य सूक्ष्मकाञ्चनवालुकम्॥ ८॥
पुण्यकर्मभिराख्याता देवर्षिकथिता: कथा:।
चक्रतुस्तौ तथाऽऽसीनौ महर्षिकथितास्तथा॥ ९॥
 
 
अनुवाद
फिर उन दोनों ने गंगा नदी में डुबकी लगाई और मन को एकाग्र करके संक्षेप में गायत्री जप पूरा किया। इसके बाद वे गंगा नदी के सुन्दर स्वर्णिम बालू से भरे तट पर आकर बैठ गए और पुण्यात्माओं, ऋषियों और महात्माओं के मुख से सुनी हुई कथाएँ कहने और सुनने लगे।
 
Then both of them took a dip in the river Ganga and after concentrating their minds completed the Gayatri Japa in brief. After this, they came to the beautiful bank of the river Ganga filled with fine golden sand and sat down and started narrating and listening to the stories they had heard from the mouths of pious men, sages and great sages. 8-9.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)