श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 228: दैत्योंको त्यागकर इन्द्रके पास लक्ष्मीदेवीका आना तथा किन सद्‍गुणोंके होनेपर लक्ष्मी आती हैं और किन दुर्गुणोंके होनेपर वे त्यागकर चली जाती हैं, इस बातको विस्तारपूर्वक बताना  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  12.228.65 
अनार्याश्चार्यमासीनं पर्युपासन्न तत्र ह।
आश्रमस्थान् विधर्मस्था: प्राद्विषन्त परस्परम्॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
राक्षसों के यहाँ अनार्य लोग वहाँ बैठे हुए आर्य पुरुषों की सेवा करने के लिए आगे नहीं आते। दुष्टात्मा राक्षस आश्रम में निवास करने वाले महात्माओं से तथा आपस में भी द्वेष रखते हैं ॥65॥
 
In the demons' place, the non-Aryans do not come forward to serve the Aryan men sitting there. The evil-doing demons hate the great souls residing in the ashram as well as among themselves. ॥ 65॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)