vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 12: शान्ति पर्व
»
अध्याय 228: दैत्योंको त्यागकर इन्द्रके पास लक्ष्मीदेवीका आना तथा किन सद्गुणोंके होनेपर लक्ष्मी आती हैं और किन दुर्गुणोंके होनेपर वे त्यागकर चली जाती हैं, इस बातको विस्तारपूर्वक बताना
»
श्लोक 64
श्लोक
12.228.64
उत्सूर्यशायिनश्चासन् सर्वे चासन् प्रगेनिशा:।
अवर्तन् कलहाश्चात्र दिवारात्रं गृहे गृहे॥ ६४॥
अनुवाद
अब वे सूर्योदय तक सोने लगे हैं। वे सुबह को ही रात समझते हैं। उनके घरों में दिन-रात कलह-कलेश रहता है। 64.
Now they have started sleeping till sunrise. They consider the morning as night. There is strife in their homes day and night. 64.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×