श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 228: दैत्योंको त्यागकर इन्द्रके पास लक्ष्मीदेवीका आना तथा किन सद्‍गुणोंके होनेपर लक्ष्मी आती हैं और किन दुर्गुणोंके होनेपर वे त्यागकर चली जाती हैं, इस बातको विस्तारपूर्वक बताना  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  12.228.63 
पायसं कृसरं मांसमपूपानथ शष्कुली:।
अपाचयन्नात्मनोऽर्थे वृथा मांसान्यभक्षयन्॥ ६३॥
 
 
अनुवाद
उन्हें खीर, खिचड़ी, मांस, पूड़ी-पूरी आदि भोजन केवल अपने ही खाने के लिए तैयार मिलता है और वे व्यर्थ ही मांस खाते हैं ॥ 63॥
 
They get food like kheer, khichdi, meat, puri and puri etc. prepared only for their own consumption and they eat meat in vain. ॥ 63॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)