vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 12: शान्ति पर्व
»
अध्याय 228: दैत्योंको त्यागकर इन्द्रके पास लक्ष्मीदेवीका आना तथा किन सद्गुणोंके होनेपर लक्ष्मी आती हैं और किन दुर्गुणोंके होनेपर वे त्यागकर चली जाती हैं, इस बातको विस्तारपूर्वक बताना
»
श्लोक 63
श्लोक
12.228.63
पायसं कृसरं मांसमपूपानथ शष्कुली:।
अपाचयन्नात्मनोऽर्थे वृथा मांसान्यभक्षयन्॥ ६३॥
अनुवाद
उन्हें खीर, खिचड़ी, मांस, पूड़ी-पूरी आदि भोजन केवल अपने ही खाने के लिए तैयार मिलता है और वे व्यर्थ ही मांस खाते हैं ॥ 63॥
They get food like kheer, khichdi, meat, puri and puri etc. prepared only for their own consumption and they eat meat in vain. ॥ 63॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×