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mahabharat 12.228.56: महापुरुष होते हुए भी राक्षस और दानव अपने माता-पिता, गुरुजनों, अतिथियों और वृद्धजनों का अभिवादन नहीं करते। वे अपने बच्चों के पालन-पोषण पर भी ध्यान नहीं देते ॥56॥   |   mahabharat अध्याय 12.228: दैत्योंको त्यागकर इन्द्रके पास लक्ष्मीदेवीका आना तथा किन सद्‍गुणोंके होनेपर लक्ष्मी आती हैं और किन दुर्गुणोंके होनेपर वे त्यागकर चली जाती हैं, इस बातको विस्तारपूर्वक बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 228: दैत्योंको त्यागकर इन्द्रके पास लक्ष्मीदेवीका आना तथा किन सद्‍गुणोंके होनेपर लक्ष्मी आती हैं और किन दुर्गुणोंके होनेपर वे त्यागकर चली जाती हैं, इस बातको विस्तारपूर्वक बताना  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  12.228.56 
मातरं पितरं वृद्धमाचार्यमतिथिं गुरुम्।
गुरुत्वान्नाभ्यनन्दन्त कुमारान् नान्वपालयन्॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
महापुरुष होते हुए भी राक्षस और दानव अपने माता-पिता, गुरुजनों, अतिथियों और वृद्धजनों का अभिवादन नहीं करते। वे अपने बच्चों के पालन-पोषण पर भी ध्यान नहीं देते ॥56॥
 
In spite of being great men, devils and demons do not greet their parents, elders, teachers, guests and elders. They also do not pay attention to the upbringing of their children. ॥ 56॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)