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mahabharat 12.228.48: निद्रा, आलस्य, दुःख, कुदृष्टि, अविवेक, द्वेष, दुःख और कामना आदि दुर्गुण उसमें प्रवेश नहीं कर सके ॥48॥   |   mahabharat अध्याय 12.228: दैत्योंको त्यागकर इन्द्रके पास लक्ष्मीदेवीका आना तथा किन सद्‍गुणोंके होनेपर लक्ष्मी आती हैं और किन दुर्गुणोंके होनेपर वे त्यागकर चली जाती हैं, इस बातको विस्तारपूर्वक बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 228: दैत्योंको त्यागकर इन्द्रके पास लक्ष्मीदेवीका आना तथा किन सद्‍गुणोंके होनेपर लक्ष्मी आती हैं और किन दुर्गुणोंके होनेपर वे त्यागकर चली जाती हैं, इस बातको विस्तारपूर्वक बताना  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  12.228.48 
निद्रा तन्द्रीरसम्प्रीतिरसूयाथानवेक्षिता।
अरतिश्च विषादश्च स्पृहा चाप्यविशन्न तान्॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
निद्रा, आलस्य, दुःख, कुदृष्टि, अविवेक, द्वेष, दुःख और कामना आदि दुर्गुण उसमें प्रवेश नहीं कर सके ॥48॥
 
The vices like sleep, laziness, unhappiness, evil eye, indiscretion, dislike, sadness and desire etc. could not enter into him. 48॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)