श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 228: दैत्योंको त्यागकर इन्द्रके पास लक्ष्मीदेवीका आना तथा किन सद्‍गुणोंके होनेपर लक्ष्मी आती हैं और किन दुर्गुणोंके होनेपर वे त्यागकर चली जाती हैं, इस बातको विस्तारपूर्वक बताना  »  श्लोक 46-47
 
 
श्लोक  12.228.46-47 
नित्यं दानं तथा दाक्ष्यमार्जवं चैव नित्यदा।
उत्साहोऽथानहंकार: परमं सौहृदं क्षमा॥ ४६॥
सत्यं दानं तप: शौचं कारुण्यं वागनिष्ठुरा।
मित्रेषु चानभिद्रोह: सर्वं तेष्वभवत् प्रभो॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
प्रभु! नित्य दान, चतुराई, सरलता, उत्साह, अहंकार का अभाव, परम सौहार्द, क्षमा, सत्य, दान, तप, पवित्रता, दया, मृदु वचन, मित्रों के साथ विश्वासघात न करने की भावना - ये सब सद्गुण उनमें सदैव विद्यमान रहते थे ॥ 46-47॥
 
Prabhu! Constant charity, cleverness, simplicity, enthusiasm, absence of ego, utmost cordiality, forgiveness, truth, charity, austerity, purity, compassion, soft words, the feeling of not betraying friends - all these good qualities were always present in him. ॥ 46-47॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)