श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 228: दैत्योंको त्यागकर इन्द्रके पास लक्ष्मीदेवीका आना तथा किन सद्‍गुणोंके होनेपर लक्ष्मी आती हैं और किन दुर्गुणोंके होनेपर वे त्यागकर चली जाती हैं, इस बातको विस्तारपूर्वक बताना  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  12.228.45 
नैवाकाशे न पशुषु वियोनौ च न पर्वसु।
इन्द्रियस्य विसर्गं ते रोचयन्ति कदाचन॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
आकाश में, पशुओं के बीच, विपरीत योनि में तथा उत्सव के अवसर पर वीर्यपात करना उन्होंने अच्छा नहीं समझा ॥45॥
 
He did not consider it to be good to ejaculate in the sky, among animals, in the opposite vagina or on festival occasions. ॥ 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)