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mahabharat 12.228.43: वे अपने पितरों, देवताओं और अतिथियों का विधिपूर्वक पूजन करते थे और उन्हें भोजन कराकर बचे हुए अन्न को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते थे। वे सभी सत्यवादी और तपस्वी थे॥ 43॥   |   mahabharat अध्याय 12.228: दैत्योंको त्यागकर इन्द्रके पास लक्ष्मीदेवीका आना तथा किन सद्‍गुणोंके होनेपर लक्ष्मी आती हैं और किन दुर्गुणोंके होनेपर वे त्यागकर चली जाती हैं, इस बातको विस्तारपूर्वक बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 228: दैत्योंको त्यागकर इन्द्रके पास लक्ष्मीदेवीका आना तथा किन सद्‍गुणोंके होनेपर लक्ष्मी आती हैं और किन दुर्गुणोंके होनेपर वे त्यागकर चली जाती हैं, इस बातको विस्तारपूर्वक बताना  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  12.228.43 
पितॄन् देवातिथींश्चैव यथावत् तेऽभ्यपूजयन्।
अवशेषाणि चाश्नन्ति नित्यं सत्यतपोधृता:॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
वे अपने पितरों, देवताओं और अतिथियों का विधिपूर्वक पूजन करते थे और उन्हें भोजन कराकर बचे हुए अन्न को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते थे। वे सभी सत्यवादी और तपस्वी थे॥ 43॥
 
They used to worship their ancestors, gods and guests according to the rituals and after offering food to them, they used to receive the leftover food as prasad. All of them were truthful and ascetics.॥ 43॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)