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mahabharat 12.228.41: वे दुःखी, दुःखी, चिन्तित, भयभीत, रोगी, दुर्बल, पीड़ित तथा सर्वस्व खो चुके मनुष्य को सदैव सान्त्वना देते थे ॥ 41॥   |   mahabharat अध्याय 12.228: दैत्योंको त्यागकर इन्द्रके पास लक्ष्मीदेवीका आना तथा किन सद्‍गुणोंके होनेपर लक्ष्मी आती हैं और किन दुर्गुणोंके होनेपर वे त्यागकर चली जाती हैं, इस बातको विस्तारपूर्वक बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 228: दैत्योंको त्यागकर इन्द्रके पास लक्ष्मीदेवीका आना तथा किन सद्‍गुणोंके होनेपर लक्ष्मी आती हैं और किन दुर्गुणोंके होनेपर वे त्यागकर चली जाती हैं, इस बातको विस्तारपूर्वक बताना  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  12.228.41 
त्रस्तं विषण्णमुद्विग्नं भयार्तं व्याधितं कृशम्।
हृतस्वं व्यसनार्तं च नित्यमाश्वासयन्ति ते॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
वे दुःखी, दुःखी, चिन्तित, भयभीत, रोगी, दुर्बल, पीड़ित तथा सर्वस्व खो चुके मनुष्य को सदैव सान्त्वना देते थे ॥ 41॥
 
He would always comfort the distressed, the sad, the anxious, the fearful, the diseased, the weak and the afflicted, and the person who had lost everything. ॥ 41॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)