श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 228: दैत्योंको त्यागकर इन्द्रके पास लक्ष्मीदेवीका आना तथा किन सद्‍गुणोंके होनेपर लक्ष्मी आती हैं और किन दुर्गुणोंके होनेपर वे त्यागकर चली जाती हैं, इस बातको विस्तारपूर्वक बताना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  12.228.37 
नैनानभ्युदियात् सूर्यो न चाप्यासन् प्रगेशया:।
रात्रौ दधि च सक्तूंश्च नित्यमेव व्यवर्जयन्॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
राक्षस कभी सुबह सोते नहीं थे। सोते समय सूर्य उदय नहीं होता था; अर्थात् सूर्योदय से पहले जाग जाते थे। रात्रि में दही-सत्तू नहीं खाते थे। 37.
 
The demons never slept in the morning. The sun did not rise while they were sleeping; that is, they would wake up before sunrise. They would never eat curd and sattu at night. 37.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)