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mahabharat 12.228.35: वह अपने सेवकों और मंत्रियों को संतुष्ट रखता था। वह कृतज्ञ और मधुरभाषी था। वह सबका उचित आदर करता था, सबको धन देता था, विनय का आदर करता था और व्रतों और नियमों का पालन करता था॥ 35॥   |   mahabharat अध्याय 12.228: दैत्योंको त्यागकर इन्द्रके पास लक्ष्मीदेवीका आना तथा किन सद्‍गुणोंके होनेपर लक्ष्मी आती हैं और किन दुर्गुणोंके होनेपर वे त्यागकर चली जाती हैं, इस बातको विस्तारपूर्वक बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 228: दैत्योंको त्यागकर इन्द्रके पास लक्ष्मीदेवीका आना तथा किन सद्‍गुणोंके होनेपर लक्ष्मी आती हैं और किन दुर्गुणोंके होनेपर वे त्यागकर चली जाती हैं, इस बातको विस्तारपूर्वक बताना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  12.228.35 
संतुष्टभृत्यसचिवा: कृतज्ञा: प्रियवादिन:।
यथार्हमानार्थकरा ह्रीनिषेवा यतव्रता:॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
वह अपने सेवकों और मंत्रियों को संतुष्ट रखता था। वह कृतज्ञ और मधुरभाषी था। वह सबका उचित आदर करता था, सबको धन देता था, विनय का आदर करता था और व्रतों और नियमों का पालन करता था॥ 35॥
 
He kept his servants and ministers satisfied. He was grateful and sweet-spoken. He respected everyone properly, gave money to everyone, respected modesty and followed fasts and rules.॥ 35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)