श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 228: दैत्योंको त्यागकर इन्द्रके पास लक्ष्मीदेवीका आना तथा किन सद्‍गुणोंके होनेपर लक्ष्मी आती हैं और किन दुर्गुणोंके होनेपर वे त्यागकर चली जाती हैं, इस बातको विस्तारपूर्वक बताना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  12.228.33 
अमर्षेण न चान्योन्यं स्पृहयन्ते कदाचन।
न च जातूपतप्यन्ति धीरा: परसमृद्धिभि:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
वे कभी ईर्ष्यावश एक-दूसरे से नाराज़ नहीं हुए। सभी शांत स्वभाव के थे। उन्हें कभी दूसरों की समृद्धि देखकर दुःख नहीं हुआ।
 
They never resented each other out of jealousy. All were of calm nature. They never felt sad about the prosperity of others.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)