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mahabharat 12.228.30: पहले राक्षस लोग दान, अध्ययन और यज्ञ में लगे रहते थे। वे देवताओं, गुरुओं, पितरों और अतिथियों का पूजन करते थे। वे सत्य का भी पालन करते थे॥30॥   |   mahabharat अध्याय 12.228: दैत्योंको त्यागकर इन्द्रके पास लक्ष्मीदेवीका आना तथा किन सद्‍गुणोंके होनेपर लक्ष्मी आती हैं और किन दुर्गुणोंके होनेपर वे त्यागकर चली जाती हैं, इस बातको विस्तारपूर्वक बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 228: दैत्योंको त्यागकर इन्द्रके पास लक्ष्मीदेवीका आना तथा किन सद्‍गुणोंके होनेपर लक्ष्मी आती हैं और किन दुर्गुणोंके होनेपर वे त्यागकर चली जाती हैं, इस बातको विस्तारपूर्वक बताना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  12.228.30 
दानाध्ययनयज्ञेज्यापितृदैवतपूजनम्।
गुरूणामतिथीनां च तेषां सत्यमवर्तत॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
पहले राक्षस लोग दान, अध्ययन और यज्ञ में लगे रहते थे। वे देवताओं, गुरुओं, पितरों और अतिथियों का पूजन करते थे। वे सत्य का भी पालन करते थे॥30॥
 
Earlier the demons used to remain engaged in charity, studies and performing Yagyas. They used to worship Gods, Gurus, ancestors and guests. Truth was also followed by them.॥ 30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)