श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 228: दैत्योंको त्यागकर इन्द्रके पास लक्ष्मीदेवीका आना तथा किन सद्‍गुणोंके होनेपर लक्ष्मी आती हैं और किन दुर्गुणोंके होनेपर वे त्यागकर चली जाती हैं, इस बातको विस्तारपूर्वक बताना  »  श्लोक 14-15
 
 
श्लोक  12.228.14-15 
तत्राभिरूपशोभाभिरप्सरोभि: पुरस्कृताम्।
बृहतीमंशुमत्प्रख्यां बृहद्भानोरिवार्चिषम्॥ १४॥
नक्षत्रकल्पाभरणां तां मौक्तिकसमस्रजम्।
श्रियं ददृशतु: पद्मां साक्षात् पद्मदलस्थिताम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
उस विमान में उन दोनों ने पद्मा नाम से विख्यात देवी लक्ष्मी को कमल की पंखुड़ी पर विराजमान देखा। अनेक सुंदर अप्सराएँ उनके सामने खड़ी थीं। देवी लक्ष्मी का आकार विशाल था। वे सूर्य के समान तेजस्वी थीं और प्रज्वलित अग्नि की ज्वाला के समान चमक रही थीं। उनके आभूषण तारों के समान चमक रहे थे। मोतियों जैसे रत्नों के हार उनके गले की शोभा बढ़ा रहे थे।
 
In that plane, both of them saw Goddess Lakshmi, who is famous by the name of Padma, sitting on a lotus petal. Many beautiful Apsaras were standing in front of her. Goddess Lakshmi's figure was huge. She was as radiant as the Sun with her eyes and was glowing like the flames of a blazing fire. Her ornaments were shining like stars. Necklaces of pearl-like gems were enhancing the beauty of her neck. 14-15.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)