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mahabharat 12.227.95-96h: देहधारी प्राणी प्रमादवश सो जाते हैं; किन्तु समय सदैव जागृत और सजग रहता है। किसी ने पहले कभी नहीं देखा कि प्रयत्न करने से समय को पीछे धकेला जा सकता है॥95 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 12.227: इन्द्र और बलिका संवाद—काल और प्रारब्धकी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 227: इन्द्र और बलिका संवाद—काल और प्रारब्धकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 95-96h
 
 
श्लोक  12.227.95-96h 
अप्रमत्त: प्रमत्तेषु कालो जागर्ति देहिषु॥ ९५॥
प्रयत्नेनाप्यपक्रान्तो दृष्टपूर्वो न केनचित्।
 
 
अनुवाद
देहधारी प्राणी प्रमादवश सो जाते हैं; किन्तु समय सदैव जागृत और सजग रहता है। किसी ने पहले कभी नहीं देखा कि प्रयत्न करने से समय को पीछे धकेला जा सकता है॥95 1/2॥
 
‘The embodied beings fall asleep in negligence; but time is always alert and awake. No one has ever seen before that time can be pushed back by someone's efforts.॥ 95 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)